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बिहार-बंगाल का प्रदूषण अब हिमालय के ग्लेशियरों तक पहुंचा

मनीष कुमार
९ जून २०२६

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की एक रिसर्च रिपोर्ट बता रही है कि बिहार और बंगाल के प्रदूषण की चपेट में हिमालय के ग्लेशियर भी आ गए हैं. केवल एक दशक में वायु प्रदूषण 20 प्रतिशत बढ़ गया है.

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फरवरी 2022 में भारत के हिमालयी क्षेत्र की जंस्कार नदी में साउना स्नान लेते लद्दाखी लोग
भारत के हिमालयी क्षेत्र की जंस्कार नदी में साउना स्नान लेते लद्दाखी लोग तस्वीर: Mohd Arhaan ARCHER/AFP

नासा द्वारा किए गए बीते 25 साल के सैटेलाइट आंकड़ों के गहन विश्लेषण (ब्लैक सूट एंड सर्वाइवल ऑफ तिब्बतन ग्लेशियर) से पता चला है कि बिहार समेत देश के मैदानी इलाकों में तेजी से फैल रहा प्रदूषण हिमालयी परिक्षेत्र तक पहुंच गया है. प्रसिद्ध जर्नल 'एटमॉस्फेरिक एनवायर्नमेंट' में प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट में बताया गया है कि इससे सफेद बर्फ की चादर से आच्छादित रहने वाले ग्लेशियर तेजी से काले पड़ रहे हैं और वे तेजी से पिघल रहे हैं.

वर्ष 2000 से 2024 के बीच के डाटा के अध्ययन से पता चला है कि सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों, हिमालयी क्षेत्रों और उत्तर-पूर्व भारत में हो रहे प्रदूषण में पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) में 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, जबकि वाहनों के धुएं और बायोमास के जलने से हवा में ऑर्गेनिक कार्बन और सल्फेट की मात्रा में 50 फीसद से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस वजह से ब्लैक कार्बन उड़कर पहाड़ों की बर्फ पर जमा हो रहा है, जिससे वे काली होती जा रही है.

वायु प्रदूषण से गर्भवती मां और उसके बच्चे को भी खतरा

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट, काठमांडू की हिंदुकुश हिमालय असेसमेंट रिपोर्ट भी इस बात की ताकीद कर रही है कि 2010 के बाद से हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसका बड़ा कारण प्रदूषण की वजह से जमा होने वाला ब्लैक कार्बन है.

प्रदूषण में बिहार-बंगाल सबसे अव्वल

कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट के स्रोतों के हवाले से जारी इस रिपोर्ट में वायु में मौजूद प्रदूषण और धुएं के कणों (एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ) को मापा गया है. हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार बिहार और बंगाल में प्रदूषण का स्तर सबसे घातक स्तर पर सबसे अधिक क्रमश: 0.71 और 0.70 पाया गया है. ये दोनों राज्य देश के प्रदूषण हॉटस्पॉट बन गए हैं.

वहीं, फसल अवशेष (पराली) और धूल की वजह से पंजाब व हरियाणा का संयुक्त इंडेक्स 0.51 रहा. जबकि, उत्तर-पूर्व भारत में यह स्कोर 0.40 रहा. थर्मल पावर प्लांट, बायोमास जलने और शहरी ठोस कचरा जलने के  कारण लगातार होने वाले उत्सर्जन से प्रदूषण की स्थिति गंभीर होती जा रही है.

भारत के विकास को खा जा रहा प्रदूषण

इससे यह भी साफ हो गया है कि अभी तक देश में बायोमास (यथा, लकड़ी व गोबर के उपले) जलाने की समस्या का समाधान नहीं हो सका है. पर्यावरणविद् पीके दास कहते हैं, ‘‘दक्षिण एशियाई देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में जनसंख्या का घनत्व ज्यादा है और यहां तेजी से हो रहे औद्योगिकीकरण तथा इंफ्रास्ट्रक्चर व विकास के अन्य कारणों की वजह से एटमॉस्फेरिक एरोसोल के कारण वायु की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है. बिहार व बंगाल भौगोलिक रूप से पूर्वी हिमालय के नजदीक है, इसलिए वायुमंडलीय हवाओं की वजह से सिक्किम, भूटान व नेपाल के ग्लेशियर प्रदूषण से जल्द प्रभावित हो जा रहे. ये आने वाले दिनों में बड़ी तबाही के संकेत हैं.''

कैसे प्रभावित हो रहा हिमालय

शोध के अनुसार, मैदानों में हो रहा उत्सर्जन मानसूनी और सर्द हवाओं के साथ उडक़र हिमालय परिक्षेत्र में पहुंच रहा और वहां एरोसोल की मात्रा को प्रभावित कर रहा. एरोसोल वातावरण में धूल, कालिख और रासायनिक बूंदों जैसे सूक्ष्म ठोस या तरल कणों के सस्पेंशन को कहा जाता है. पंजाब, हरियाणा और दिल्ली का प्रदूषण हिमालय की पश्चिमी और मध्य श्रेणियों तक पहुंच रहा, जबकि बिहार और पश्चिम बंगाल का प्रदूषण पूर्वी हिमालय को नुकसान पहुंचा रहा है.

प्रदूषित दिल्ली में साफ हवा देने की कोशिश करते 'ग्रीन' कैफे

रिपोर्ट के अनुसार जो प्रदूषण 2000-2009 के दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरी पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में केंद्रित था, वह 2020-2024 तक पूरे बंगाल, बिहार, बांग्लादेश और असम, मेघालय और त्रिपुरा तक फैल गया. सूर्य की रोशनी को रिफ्लेक्ट करना बर्फ का प्राकृतिक गुण है, जिसे अल्बीडो इफेक्ट कहा जाता है. लेकिन ब्लैक कार्बन जमा होने की वजह से यह रोशनी को रिफ्लेक्ट करने की बजाय सोखने लगती है, जिससे बर्फ पिघलने लगती है. दास कहते हैं, ‘‘भारत सरकार का नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) शहरों में तो वायु गुणवत्ता सुधारने की दिशा में बेहतर काम कर रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में समन्वय के साथ काफी कुछ करना शेष है. बिहार सरकार को प्रदूषण रोकने की दिशा में और भी व्यावहारिक और कठोर निर्णय लेने की जरूरत है.'' 

वहीं, मौसम वैज्ञानिक एन. के. कर्ण कहते हैं, ‘‘हिमालय की बर्फ तेजी से पिघलने लगी तो इस प्रक्षेत्र में जबरदस्त गर्मी पड़ेगी और समीपवर्ती इलाकों में रहना मुश्किल हो जाएगा. यह जलवायु परिवर्तन का भी वाहक बनेगा. पर्वतीय इलाकों में बढ़ते टूरिज्म का आफ्टर इफेक्ट भी प्रदूषण का कारण बन रहा. इन इलाकों में पर्यटकों द्वारा छोड़ी जा रही पॉलीथिन व अन्य सामग्रियां हिमालय को दीमक की तरह नुकसान पहुंचा रहीं. हर हाल में हिमालय को बचाना होगा.''