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समाजजर्मनी

लड़का पैदा होने से क्यों परेशान हैं कुछ माता-पिता?

सोनम मिश्रा डीपीए
१७ मार्च २०२६

जर्मनी में कई माता-पिता अब एक लड़की को जन्म देना चाहते हैं. कई तय धारणाएं इसकी वजह हो सकती हैं, जैसे कि यह मानना कि लड़कियां शांत और लड़के शरारती होते हैं. क्या ऐसी सोच लैंगिक बराबरी की बहस में हमें पीछे नहीं खींच रही है?

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प्रेगनेंट महिला हाथों में नीला और गुलाबी गुब्बारा लिए
सोशल-मीडिया पर ऐसे कई फोटो और वीडियो मिल जाएंगे जिसमें माता-पिता अपने होने वाले बच्चे का जेंडर बताते हैंतस्वीर: Pond5 Images / IMAGO

एक गुब्बारे में से नीले या गुलाबी रंग के रंग-बिरंगे कागज के टुकड़े गिरते हैं और माता-पिता बनने वाला जोड़ा खुशी से झूम उठता है. देखा जाए तो सोशल-मीडिया ऐसे वीडियोज से भर पड़ा है, जिसमें माता-पिता अपने होने वाले बच्चे का जेंडर सार्वजनिक तौर पर दिखाते हैं. इस दौरान कभी खुशी के आंसू बहते हैं तो कभी निराशा भी दिखती है, अगर उम्मीद के मुताबिक बच्चे का लिंग न हो. और ज्यादातर ऐसा तब देखने को मिलता है, जब गुब्बारे में से नीले रंग के कागज के टुकड़े गिरते हैं.

इस निराशा के लिए अब एक शब्द भी है ‘जेंडर डिसअपॉइंटमेंट' यानी बच्चे के लिंग को लेकर निराशा. टिकटॉक समेत कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस हैशटैग से कई ऐसी वीडियोज है, जो इस तरह की निराशा दिखाते हैं. इंटरनेट पर माता‑पिता के कई समूहों में भी कुछ महिलाएं बताती हैं कि वे हमेशा से एक लड़की चाहती थी, लेकिन अब इस बात से जूझ रही हैं कि उनका होने वाला बच्चा एक लड़का है.

क्या है इस निराशा की वजह?

जर्मनी स्थित टेक्निकल यूनिवर्सिटी ड्रेसडेन में क्लिनिकल चाइल्ड एंड यूथ साइकॉलजी की प्रोफेसर और शोधकर्ता, आना‑लेना सीटलो कहती हैं कि आज के समय में बहुत‑से माता‑पिता के लिए सिर्फ इतना काफी नहीं है कि बच्चा स्वस्थ हो. पहले की तुलना में आजकल लोग कम बच्चे पैदा करते हैं इसलिए माता‑पिता बनने को लेकर उनकी उम्मीदें बहुत ज्यादा होती हैं और बच्चे से भी कई तरह की अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं. वह मानती हैं, "माता‑पिता अपने बच्चे के लिए सब कुछ बेहतरीन ही चाहते हैं लेकिन करीब से देखें तो वह यह भी चाहते हैं कि उनका बच्चा उनकी जिंदगी की कल्पना या उम्मीद के अनुसार हो.”

कुछ पीढ़ियों पहले तक माता‑पिता एक लड़का चाहते थे, जो उनके खेत‑खलिहान का उत्तराधिकारी बन सके लेकिन अब कई अध्ययन संकेत दे रहे हैं कि पश्चिमी समाजों में लड़कियों को प्राथमिकता दी जा रही है. शोधकर्ता सीटलो कहती हैं कि कई लैंगिक विचार इसमें एक अहम भूमिका निभाते हैं. जैसे एक धारणा के अनुसार अकसर ऐसा माना जाता है कि लड़कियां आज्ञाकारी, संवेदनशील और मेहनती होती हैं, जबकि लड़के उग्र, शैतान और पढ़ाई में कमजोर होते हैं.

यह धारणाएं कितनी सच?

कील विश्वविद्यालय की जेंडर‑शोधकर्ता टीना श्पीस इन धारणाओं को आलोचनात्मक नजरिए से देखती हैं. वह सवाल करती हैं, "असल में इसके क्या मायने हैं, जब हमारे दिमाग में लड़कियों और लड़कों की ऐसी भूमिका तय होती हैं?” उनके अनुसार यह बहस हमें काफी पीछे खींच ले जाती है.

वह कहती हैं, "मैं लिंग‑भूमिकाओं की फिर से पारंपरिक रूप में वापसी देख रही हूं और सोशल मीडिया इसे और मजबूत कर रहा है.” कई अन्य विशेषज्ञ भी इसी तरह की जटिल और संतुलित तस्वीर की ओर इशारा करते हैं, चाहे वह शिक्षा में सफलता की बात हो या बुजुर्ग माता‑पिता की देखभाल करने की या फिर मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा हो.

करियर के मामले में कौन है आगे?

डॉर्टमुंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी की शिक्षा विशेषज्ञ, रिकार्डा श्टाइनमायर कहती हैं कि लड़कों की तुलना में अब लड़कियां अधिक पढ़ाई करती हैं. कई अलग-अलग अध्यनों में सामने आया है कि पढ़ने के मामले में आमतौर पर लड़कियां लड़कों से आगे रहती हैं, जबकि गणित जैसे विषय में लड़के आगे रहते हैं. उन्होंने आगे कहा, "स्कूल में मिले अंकों के हिसाब से देखा जाए, तो यह अंतर ज्यादा बड़ा भी नहीं है.”

उन्होंने आगे कहा, "लड़कियों को सभी विषयों में बेहतर अंक मिलते हैं, दुनिया भर में ऐसा ही देखा गया है,” लड़कियों के समान ही लड़कों का प्रदर्शन होने के बावजूद भी उन्हे उच्चतर स्कूल के लिए कम सिफारिश मिलती है. उन्हें कई बार कक्षा दोहरानी पड़ती है और वह पढ़ाई भी पहले छोड़ देते हैं. विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, इसका एक कारण लड़कों का व्यवहार भी हो सकता है. उनके अनुसार, "लड़कियां पढ़ाई के लिए ज्यादा प्रेरित होती हैं, अधिक व्यवस्थित रहती हैं और उनका व्यवहार भी शांत होता है.”

क्या फेमिनिज्म में पुरुषों की कोई जगह नहीं है?

वह बताती हैं कि अब धीरे-धीरे अधिक युवा महिलाएं यूनिवर्सिटी में पढ़ाई शुरू करने लगी हैं, लेकिन जब बात पीएचडी करने की आती है तो महिलाओं और पुरुषों का अनुपात बदल जाता है. पुरुष अधिक पीएचडी करते हैं और कंपनियों में भी उच्च पदों पर अधिकतर पुरुष ही नजर आते हैं.

जर्मनी के सांख्यिकी विभाग के अनुसार, आज भी महिलाएं औसतन प्रति घंटे पुरुषों से कम कमाती हैं. इसका एक कारण यह भी है कि महिलाएं अकसर कम वेतन वाली नौकरियों में काम करती हैं या पार्ट-टाइम काम करती हैं ताकि वह नौकरी के साथ-साथ बच्चों की देखभाल कर सकें और परिवार के बुज़ुर्गों का भी ख्याल रख सकें.

बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल के मामले में कौन आगे?

जर्मनी का वृद्धावस्था संबंधी अनुसंधान केंद्र (डीजेडए) नियमित रूप से 40 से 65 साल के लोगों से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछता है. इन सवालों में उनकी देखभाल से जुड़े सवाल भी पूछे जाते हैं. हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा उन लोगों की देखभाल और मदद करती हैं, जिनकी सेहत ठीक नहीं होती. आज के समय में यह अंतर कितना कम हुआ है यह तो 2026 में होने वाले नए सर्वेक्षण से ही पता चल पाएगा.

अगर किसी की बेटी है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह जरूर अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल करेगी. अध्ययन के अनुसार, "बुढ़ापे में अपने बच्चों से देखभाल और मदद मिलना कोई पक्की बात नहीं है, चाहे बच्चा बेटा हो या बेटी.” 2023 के एक सर्वेक्षण में पता चला था कि जिन लोगों के माता-पिता को देखभाल की जरूरत है, उनमें से सिर्फ 47.5 फीसदी लोग ही वास्तव में उनका ख्याल रखते हैं.

डीजेडए के अनुसार, आगे चलकर बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल करेंगे या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है. अध्ययनों से पता चलता है कि इसकी संभावना तब अधिक होती है, जब माता-पिता ने पहले अपने बच्चों की भी मदद की हो, जैसे पोते-पोतियों की देखभाल करने में. इसके अलावा भावनात्मक संबंध यानी प्यार-लगाव और कर्तव्य की भावना भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इनमें से कुछ बातों को माता-पिता का व्यवहार प्रभावित करता हैं, चाहे उनके पास बेटा हो या बेटी इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता है.

माता-पिता के लिए किसे संभालना ज्यादा आसान है?

जिन बच्चों को मानसिक समस्याएं होती हैं या जो बच्चे इंटरनेट में काफी समय बिताते हैं, उन्हे संभालना माता-पिता के लिए मुश्किल हो सकता है. यहां पर सवाल आता है कि इस मामले में कौन अधिक संवेदनशील होता है, लड़कियां या लड़के? जेआईएम-स्टडी के अनुसार, लड़के और लड़कियां दोनों ही लगभग बराबर समय स्मार्टफोन पर बिताते हैं, लेकिन वे इंटरनेट का इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से करते हैं.

म्यूनिख के जर्मन यूथ इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता, आलेक्जांडर लांगमायर-टोरनियर के अनुसार, "लड़के ज्यादातर ऑनलाइन गेम खेलते हैं और वह लड़कियों की तुलना में पहले खेलना शुरू कर देते हैं. जबकि लड़कियां ज्यादातर सोशल मीडिया पर समय बिताती हैं या यूटयूब पर मेकअप से जुड़े वीडियो देखती हैं.

किस उम्र में करें बच्चों से जेंडर की बात?

लांगमायर-टोरनियर कहते हैं कि अगर मानसिक स्वास्थ्य की बात की जाए, तो लड़के अक्सर स्कूल में ज्यादा समस्या पैदा करते हुए दिखाई देते हैं और उनमें एडीएचएस (ध्यान की कमी और सक्रियता की कमी) समस्या भी अधिक होती है. दूसरी ओर, लड़कियों में डिप्रेशन और चिंता से जुड़ी बीमारियां अधिक देखी जाती है लेकिन यह समस्याएं बाहरी तौर पर आसानी से नजर नहीं आती हैं.

उनके अनुसार, शायद इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि कुछ माता-पिता लड़कियों को थोड़ा ज्यादा पसंद करते हैं. वह कहते हैं, "लड़कियों को भी लड़कों जितनी बल्कि कभी-कभी उनसे भी ज्यादा मानसिक समस्याएं होती हैं, लेकिन अकसर वह इतने स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता है.

सोशल-मीडिया ट्रेंड्स का भी हाथ

सोशल मीडिया में इन्फ्लुएंसर अक्सर अपने परिवार को बहुत सुंदर तरीके से दिखाना पसंद करते हैं. कई तरह के ट्रेंड चलते हैं, जैसे माता-पिता और बच्चों का एक जैसे कपड़े पहनकर फोटो लेना. सीटलो कहती हैं कि यह आम बात है कि कई माता-पिता एक "मिनी-मी” (अपने जैसा छोटा रूप) चाहते हैं. वह चाहते हैं कि अपने बच्चे को वह सब दे सकें, जो वह खुद अपने बचपन में चाहते थे. एक अध्ययन में सामने आया कि महिलाएं ज्यादातर लड़कियां चाहती हैं, जबकि पुरुष ज्यादातर लड़के चाहते हैं.

कई दूसरी स्टडीज में सिर्फ महिलाओं से ही ऐसे सवाल पूछे गए थे. यहां सवाल उठता है कि क्या लड़कियों को ज्यादा पसंद करने की बात सिर्फ एक गलत धारणा भी हो सकती है? सीटलो कहती हैं कि यह भी जरूरी है कि हम ध्यान से देखें कि ऐसी स्टडीज से असल में किस तरह के निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. वह यह भी सवाल उठाती हैं, "अगर किसी व्यक्ति ने पहले बच्चे का कोई दूसरा लिंग (जैसे लड़का या लड़की) चाहा था, इसका मतलब यह है कि वह बच्चे के असली लिंग से निराश है?”

सीटलो अपने क्लिनिक के अनुभव से कहती हैं, "जब बच्चा पैदा हो जाता है, तो आमतौर पर माता-पिता के लिए बच्चे का लिंग (लड़का या लड़की) खास मायने नहीं रखता है.” वह यह भी कहती हैं कि अब एक नया ट्रेंड भी दिखाई दे रहा है. वह कहती हैं, "आजकल कुछ माता-पिता जानबूझकर बच्चे का लिंग पहले से जानना नहीं चाहते या अगर उन्हें पता भी होता है तो वह दूसरों को बताना नहीं चाहते हैं ताकि लड़का-लड़की से जुड़ी पुरानी तय धारणाओं से बच जा सके.”