भारत और ईयू की डील के कुछ अहम पहलू
यूरोपीय संघ और भारत जनवरी 2026 में एक बहुत ही बड़ी मुक्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं. जानिए लंबी बातचीत के बाद तय हुई इस संधि के भीतर छुपे तकनीकी पहलुओं को.

दस्तखत के बाद की परीक्षा
भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि पर दस्तखत करने के बाद ईयू की संसद में भी इसे मंजूरी मिलनी चाहिए. उसके बाद भी प्रक्रिया पूरी होने में साल भर तक का समय लग सकता है.
भारत की बड़ी तकलीफ दूर
इस द्विपक्षीय समझौते से भारत के टेक्सटाइल और ज्वेलरी सेक्टर को बड़ी राहत मिल सकती है. अगस्त 2025 से भारत के ये दोनों सेक्टर अमेरिका में 50 फीसदी टैरिफ झेल रहे हैं.
यूरोपीय संघ को कितना लाभ
यूरोपीय संघ को लगता है कि उसके उद्योगों को भारत का बड़ा और तेजी से आगे बढ़ता बाजार मिलेगा. साथ ही सप्लाई चेन पर चीन के दबदबे को कम करने में भी ईयू भारत को मददगार के तौर पर देख रहा है.
भारत की ख्वाहिशें
नई दिल्ली, अपने कुशल पेशवरों के लिए ईयू में रोजगार के आसान मौके बनाना चाहती है. साथ ही भारत, यूरोपीय संघ को बड़े स्तर पर आईटी सेवाएं भी मुहैया कराना चाहता है.
ईयू की ख्वाहिशें
भारत में यूरोपीय संघ के वाहनों, ऑटो पार्ट्स, रसायनों और प्लास्टिक पर बहुत ज्यादा आयात शुल्क लगता है. डील से इस आयात शुल्क काफी कमी आने की उम्मीद है.
कहां खींची हैं लाल लकीरे
कृषि और डेयरी उद्योग को डील से बाहर रखा गया है. यह भारत के लिए संवेदनशील मुद्दा है. वहीं ईयू, वाहनों और वाइन जैसे उत्पादों के लिए भारत का लचीला रुख चाहता है.
दोहरे भुगतान का मामला
भारत चाहता है कि ईयू के डेटा नियमों के तहत उसे "डेटा सिक्योर" स्टेटस मिले. साथ ही दोनों महाद्वीपों में आते जाते हुए काम करने वालों के लिए वह सामाजिक सुरक्षा प्रणाली में दोहरे भुगतान को टालना चाहता है.
वित्तीय बाजार और बौद्धिक संपदा की सुरक्षा
यूरोपीय संघ, भारत की वित्तीय व कानूनी सेवाओं में ज्यादा भागीदारी चाहता है. साथ ही वह श्रम, पर्यावरण और बौद्धिक संपदा अधिकार पर भी भारत से पक्का वचन चाहता है. नई दिल्ली यहां लचीलेपन को तरजीह देती है.
क्या है बिल्कुल नागवार
भारत को ईयू के कार्बन टैक्स, नियमावली, मानक मापदंड और महंगी सर्टिफिकेशन से जुड़ी बाधाओं की चिंता है. इनके जरिए भारत का निर्यात प्रभावित हो सकता है. वहीं ईयू को भारत में बौद्धिक संपदा की चोरी और फिर उस पर लंबी मुकदमेबाजी डराती है.
बदलती दुनिया में दोनों के लिए जीत का मौका
विश्लेषकों का कहना है कि दुनिया की बदलती भूराजनीति और कारोबारी नीतियां दोनों पक्षों को एक दूसरे के करीब ला रही हैं. दोनों कई मामलों में समझौतावादी रुख अपना रहे हैं. द्विपक्षीय कारोबार के जरिए आदर्श भुगतान संतुलन या उसके करीब पहुंचने का लक्ष्य है.