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ऑनलाइन गेमिंग को क्यों नहीं समझना चाहिए 'बच्चों का खेल'?

१३ फ़रवरी २०२६

गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की मौत के मामले में हुई प्रारंभिक जांच से पता चला कि वे एक 'डेयर' यानी चुनौतियां देने वाला कोरियाई ऑनलाइन गेम खेलती थीं. इस घटना ने ऑनलाइन गेमिंग के बच्चों पर बुरे असर की ओर ध्यान खींचा.

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आईपैड पर रोब्लॉक्स खेलती एक छोटी बच्ची
डेयर वाले ऑनलाइन गेम में कोई चैलेंज पूरा करने पर बच्चे इनाम पाते हैं इसलिए बच्चे को गेम खेलना मजेदार और रोमांचक लगने लगता है. जीतने की इच्छा में कुछ बच्चे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि वे खुद को नुकसान तक पहुंचा लेते हैंतस्वीर: Jessica Gow/TT/IMAGO

आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है. इन गेम्स पर लेवल पूरा करने और इनाम जीतने की चाह उन्हें लगातार बांधे रखती है. खेल के प्रति यह जुनून जानलेवा जोखिम उठाने तक ले जाता है. इसका असर बच्चे के सामाजिक, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर दिखने लगता है. एक सर्वे के अनुसार, भारत में 9 से 13 साल के लगभग 49 प्रतिशत बच्चे रोजाना तीन घंटे या उससे अधिक ऑनलाइन गेमिंग में बिताते हैं.

भारत का ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर तेजी से विकसित हो रहा है और आने वाले कुछ सालों में यह दो गुना से अधिक बढ़ने की संभावना रखता है. साल 2029 तक इस बाजार का आकार 78 हजार करोड़ रूपए तक पहुंचने का अनुमान है. जबकि सिर्फ दो साल पहले यह 31 हजार करोड़ रूपए था. 'रियल मनी गेमिंग' इस बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा है.

बैटल रॉयल, फ्री फायर,और पबजी जैसे गेम्स जल्द आदत बन जाते हैं. वहीं ब्लू व्हेल और मोमो चैलेंज बच्चों को खतरनाक स्टंट करने या अपनी निजी जानकारी साझा करने के लिए प्रेरित करते हैं. इससे उनकी सुरक्षा को गंभीर खतरा होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि गाजियाबाद जैसी घटनाएं चेतावनी देती हैं कि अगर समय रहते बच्चों के व्यवहार को नहीं समझा गया, तो इसका परिणाम घातक हो सकता है.

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट प्राची नारकर
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट प्राची नारकर बताती हैं कि समय के साथ बच्चों के मूड और हरकतों का कंट्रोल भी ऐसे गेम के सिस्टम के हाथ में चला जाता हैतस्वीर: Prachi Narkar

कैसे लगती है ऑनलाइन गेमिंग की लत?

बचपन में मस्तिष्क के कई हिस्से विकसित हो रहे होते हैं. ऑनलाइन गेम खेलने से दिमाग में डोपामिन का लेवल बढ़ता है. यह एक ऐसा केमिकल है जो किसी इंसान को खुशी और उत्साह महसूस कराता है. गेम में कोई चैलेंज पूरा करने पर बच्चे इनाम पाते हैं इसलिए बच्चे को गेम खेलना मजेदार और रोमांचक लगने लगता है. जीतने की इच्छा में कुछ बच्चे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि वे खुद को नुकसान तक पहुंचा लेते हैं.

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट प्राची नारकर बताती हैं कि समय के साथ नियंत्रण गेम के सिस्टम के हाथ में चला जाता है. वह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "इन गेम्स में तकनीक होती है जो खिलाड़ी के व्यवहार को समझकर उसी हिसाब से कंटेंट और विज्ञापन दिखाती है. इन गेम्स को आकर्षित बनाने के लिए चुनिंदा रंगों का इस्तेमाल भी किया जाता है."

न्यूरोसाइंटिस्ट अभिजीत सतानी बताते हैं कि ऐसे गेम्स बनाने वाली कंपनियां न्यूरोमार्केटिंग करती हैं. मस्तिष्क की गतिविधियों और भावनाओं को समझकर मार्केटिंग की रणनीतियां बनाई जाती हैं. इसके लिए चेहरे के भाव और ध्यान केंद्रित करने जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी किया जाता है.

मेटावर्स में बच्चों के पीछे पड़े हैं पीडोफाइल

क्या हैं शुरूआती संकेत?

कई बार देखा गया है कि जिन परिवारों में माता-पिता के बीच रोजाना झगड़े होते हैं, वहां बच्चों पर गहरा मानसिक असर पड़ता है. बच्चे समाज से काटने लगते हैं. बातचीत से बचने की कोशिश करते हैं और मोबाइल, गेम या तकनीक में ही सुकून ढूंढते हैं. बच्चों को लगता है कि उन्हें ऑनलाइन कोई चोट नहीं पहुंचाएगा और सब कुछ उनके नियंत्रण में है.

प्राची नारकर बताती हैं कि बच्चों को देखकर पता लगाया जा सकता है कि उन्हें ऑनलाइन गेमिंग की लत लग गई है. समय के साथ शारीरिक बदलाव दिखाई देने लगते हैं. वह कहती हैं, "वजन कम होना, चेहरे की रंगत फीकी पड़ना, बाल झड़ना, आंखों का लाल रहना, भूख में कमी या जरूरत से ज्यादा खाना और नींद की समस्या शुरुआती संकेत होते हैं. समय रहते ध्यान न देने पर स्थिति गंभीर रूप ले सकती है और बच्चा सेल्फ-हार्म, मूड डिसऑर्डर, मानसिक असंतुलन और आक्रामक व्यवहार की ओर बढ़ सकता है."

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट आदित्य वाडेकर
आदित्य वाडेकर एक अहम पहलू की ओर ध्यान दिलाते हैं कि ये केवल अमीर बच्चों की समस्या नहीं है, बल्कि कमजोर तबके से आने वाले बच्चों को लत लगने का जोखिम ज्यादा होता हैतस्वीर: Aditya Wadekar/DW

डीडब्ल्यू ने क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट आदित्य वाडेकर से भी बात की. उनके अनुसार कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों में भी लत विकसित होने का जोखिम अधिक होता है. वह समझाते हैं, "इन बच्चों के जीवन में संघर्ष और असुरक्षा अधिक होती है. जिससे वे तनाव से तुरंत राहत पाने के तरीके खोजते है. वे खासकर शॉर्ट-टर्म और रिवॉर्ड-आधारित गेम्स की ओर जल्दी आकर्षित होते हैं जो उन्हें तुरंत खुशी, संतोष और वास्तविक जीवन की परेशानियों से थोड़ी देर के लिए दूर ले जाए."

दिमाग की उम्र पर प्रभाव डालते हैं ऑनलाइन गेम्स

ऑनलाइन गेम्स केवल समय ही नहीं लेते. वे धीरे-धीरे मस्तिष्क के विकास को भी प्रभावित कर सकते हैं. न्यूरोसाइंटिस्ट अभिजीत सतानी कई बच्चों पर अध्ययन कर चुके हैं. वह बताते हैं कि बचपन में दिमाग बेहद लचीला होता है. उस समय मस्तिष्क में असंख्य न्यूरॉन्स आपस में जुड़कर अनगिनत कनेक्शन बनाते हैं. हर नया अनुभव जैसे गिरना, उठना, बोलना और सुनना इन कनेक्शनों को मजबूत करता है. सीखने की क्षमता को बढ़ाता है. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह प्रक्रिया धीमी होने लगती है. इसलिए वयस्कों को नई चीजें सीखने में समय लगता है.

न्यूरोसाइंटिस्ट अभिजीत सतानी
न्यूरोसाइंटिस्ट अभिजीत सतानी बताते हैं कि ऐसे गेम बच्चों के दिमाग के उस हिस्से को प्रभावित करते हैं जो ध्यान लगाने, योजना बनाने और सेल्फ-कंट्रोल में मदद करता हैतस्वीर: Abhijeet Satani

लगातार रिवॉर्ड देने वाले गेम खेलने से दिमाग में बार-बार डोपामिन रिलीज होता है. जिससे तुरंत खुशी मिलती है. मस्तिष्क इसका आदि हो जाता है. अभिजीत सतानी बताते हैं, "दिमाग छोटे और तुरंत इनाम पाने की आदत डाल लेता है. जिससे बच्चे की लंबे समय के लक्ष्य बनाकर मेहनत करने में रुचि कम होने लगती है. ऐसे गेम दिमाग के उस हिस्से को प्रभावित करते हैं जो ध्यान, योजना बनाना और आत्म-नियंत्रण में मदद करता है. यदि यह आदत लंबे समय तक बनी रहे, तो बच्चे की सोचने व सही और गलत में फर्क करने की क्षमता पर असर पड़ता है. उनका मस्तिष्क किसी 30 साल के युवक की तुलना में कमजोर हो सकता है."

लत को काबू कैसे करें?

इस तरह की लत को स्कूल, परिवार और परामर्श (काउंसलिंग) के स्तर पर मिलकर नियंत्रित किया जा सकता है. बच्चों को शुरुआत से ही सही मार्गदर्शन देना जरूरी है.

प्राची नारकर का कहना है कि परिवार बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान दें. तय समय के बाद स्क्रीन अपने-आप बंद हो जानी चाहिए. इस लत के चार स्तर होते हैं — हल्का (माइल्ड), तीव्र (एक्यूट), गंभीर (सीवियर) और बहुत गंभीर (प्रोफाउंड). अगर लत गंभीर या बहुत गंभीर स्तर पर पहुंच जाए, तो बच्चे को ठीक होने में कई साल लग सकते हैं. इसलिए समय रहते पहचान और रोकथाम बहुत महत्वपूर्ण है.

शिक्षा नीति विशेषज्ञ और सिल्वरलाइन प्रेस्टिज स्कूल के वाईस चेयरपर्सन नमन जैन
शिक्षा नीति विशेषज्ञ नमन जैन मानते हैं कि बच्चों को मोबाइल देने की बजाय उन्हें तकनीकी शिक्षा देनी चाहिएतस्वीर: Naman Jain

 

शिक्षा नीति विशेषज्ञ और सिल्वरलाइन प्रेस्टिज स्कूल के वाईस चेयरपर्सन नमन जैन मानते हैं कि बच्चों को मोबाइल देने की बजाय उन्हें तकनीकी शिक्षा प्रदान करनी चाहिए. इससे उनका दिमाग विकसित होता है, सीखने की इच्छा बढ़ती है और तकनीक का सही इस्तेमाल सीखते हैं. बच्चों को केवल यह लेबल देना कि वे गलत कर रहे हैं, समाधान नहीं है.

वह डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हमें हर स्कूल में काउंसलर उपलब्ध कराना चाहिए. दस साल पहले हमारे स्कूल में एक काउंसलर होता था. अब पांच काउंसलर्स की टीम है. साथ ही शिक्षकों को प्रशिक्षित करना भी उतना ही जरुरी है, ताकि वे बच्चों की भावनाओं और जरूरतों को समझ सकें. हमें बच्चों को ऐसे स्कूल प्रोजेक्ट देने चाहिए जो उनकी रुचि को जगाएं और उनके हुनर पर ध्यान केंद्रित करें."

बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (बिट्स) लॉ स्कूल में प्रोफेसर शीतल शिंदे
बिट्स लॉ स्कूल में प्रोफेसर शीतल शिंदे बताती हैं कि भारत में ऐसे कानून हैं जिनके तहत 'रियल मनी गेम' पर सख्त रोक और जुर्माने का प्रावधान हैतस्वीर: Sheetal Shinde

क्या भारत में ऑनलाइन गेमिंग के लिए कानून है?

बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (बिट्स) लॉ स्कूल में प्रोफेसर शीतल शिंदे बताती हैं कि भारत में 'ऑनलाइन गेमिंग संवर्धन एवं विनियमन अधिनियम, 2025' मौजूद है. इसके अंतर्गत रियल मनी गेम पर सख्त रोक और जुर्माने का प्रावधान है.

वहीं, सोशल, मनोरंजन या शैक्षिक गेम्स पर इस कानून में कोई कड़ी कार्रवाई नहीं है. ये गेम कानूनी रूप से बनाए जा सकते हैं और पंजीकरण भी कराया जा सकता है. लेकिन ये अभी कानून के तहत सीधे दंडनीय नहीं हैं.

प्रोफेसर शीतल शिंदे ने डीडब्ल्यू को बताया, "अगर कोई गेम बैन भी कर दिया जाए या वह गूगल प्ले और आईफोन ऐप स्टोर पर उपलब्ध न हो, तब भी लोग वीपीएन या किसी अन्य प्रॉक्सी के जरिए इसे डाउनलोड कर सकते हैं. ऐसे में कानून को लागू करना मुश्किल हो जाता है. केवल पाबंदी लगाने से काम नहीं चलेगा. यह सुनिश्चित करना जरुरी है कि तकनीकी और सामाजिक दोनों स्तरों पर नियंत्रण और निगरानी हो. जिससे बच्चे सुरक्षित रहें और नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके."