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पाक प्रशासित कश्मीर क्यों बना पाकिस्तान के गले की फांस

२० जून २०२६

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर उबल रहा है. लोग सड़कों पर हैं. दुकानें बंद हैं. खाने-पीने और दवाओं की कमी है. लेकिन तनाव की वजह क्या है? और उन 12 सीटों का क्या खेल है, जिनके चलते यह मुद्दा पाकिस्तान के गले की फांस बन गया है.

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पाकिस्तानी कश्मीर
पाकिस्तानी कश्मीर के लोग चाहते हैं कि उनकी विधानसभा में उन 12 सीटों को खत्म किया जाए, जिन पर जीतने वाले लोगों को पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग चुनते हैं.तस्वीर: DW

भारत जिस इलाके को पाक अधिकृत कश्मीर कहता है, पाकिस्तान उसके एक हिस्से को आजाद कश्मीर कहता है, लेकिन असल में ये कितना आजाद है? वहां सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी तो कहते हैं कि इस्लामाबाद में बैठे लोग उनके इलाके को अपनी मर्जी से चलाते हैं. लेकिन अब ऐसा और नहीं चलेगा, प्रदर्शनकारी इसी बात पर अड़े हैं.

अधूरे वादे

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल समझौता होने के बाद पाकिस्तान ने झेलम नदी पर एक बांध बनाने की परियोजना शुरू की. तय हुआ कि ददियाल और मीरपुर के पास यह बांध बनेगा. 280 से ज्यादा गांवों से जमीन ली गई. एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए. उनसे वादा किया गया था कि डैम से जो बिजली और पानी मिलेगा, उसके बदले कश्मीर की सरकार को रॉयल्टी मिलेगी. पूरे क्षेत्र को मुफ्त बिजली मिलेगी. मीरपुर शहर को मुफ्त पानी मिलेगा.

लेकिन वही हुआ, जो कश्मीर और इस्लामाबाद के रिश्ते में बार-बार हुआ है. वादे धुंधले पड़ गए. आज मंगला डैम एक हजार मेगावॉट से ज्यादा बिजली बनाता है. उसकी ज्यादातर बिजली पाकिस्तान के राष्ट्रीय ग्रिड में जाती है. लेकिन पाकिस्तान की तरफ वाले कश्मीर के लोग वही बिजली महंगे दामों पर खरीदते हैं.

आज मीरपुर और ददियाल से उजड़े लोगों से बात करें तो वे कहते हैं कि मंगला डैम ने पाकिस्तान के खेतों को पानी दिया. शहरों को बिजली दी. लेकिन कश्मीरियों को क्या मिला? एक झील, जिसके नीचे उनकी दुनिया दबी हुई है. जिस पानी से पाकिस्तान के शहर रोशन हुए, वह पानी उन कब्रों के ऊपर से गुजरा, जिनमें कश्मीरियों के पुरखे सो रहे हैं.

कश्मीर का नक्शा
कश्मीर का कौन सा हिस्सा किसके पास है, इस ग्राफिक्स से समझा जा सकता है

कितना आजाद है 'आजाद कश्मीर'

उस कश्मीर की कहानी यहीं से शुरू होती है, जिसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्योंकि यह क्षेत्र न सच में आजाद है. न पाकिस्तान का पूरा प्रांत है. न कोई स्वतंत्र देश है. और अंतरराष्ट्रीय कानून में भी इसकी स्थिति साफ नहीं है. इसकी हालत ऐसी है कि कई पाकिस्तानी कानूनी विशेषज्ञ इसे "जानबूझकर रखी गई अस्पष्टता” कहते हैं.

क्योंकि यह अस्पष्टता पाकिस्तान की कश्मीर नीति के काम आती है. आजाद कश्मीर की अपनी विधानसभा है. अपना राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री है. अपनी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी है. कागज पर यह स्वायत्तता जैसा दिखता है. लेकिन असली ताकत इस्लामाबाद के पास है.

1949 के कराची समझौते और 1974 के अंतरिम संविधान ने यह तय कर दिया कि अहम फैसले पाकिस्तान के हाथ में रहेंगे. रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, विदेशी मदद, व्यापार... ये सब पाकिस्तान सरकार के नियंत्रण में हैं.

इसलिए आजाद कश्मीर को न पूरी तरह आजाद रखा गया. न पूरी तरह पाकिस्तान में शामिल किया गया. उसे बीच में छोड़ दिया गया. और इस बीच की कीमत वहां के करीब 40 लाख लोग चुकाते रहे. उनकी पाकिस्तान की संसद में कोई सीधी आवाज नहीं है. वे पाकिस्तान के आम चुनावों में वोट नहीं दे सकते. लेकिन उनके जीवन के बड़े फैसले इस्लामाबाद में होते हैं.

12 सीटों का खेल

पाकिस्तानी कश्मीर की राजनीति में एक अजीब चीज है. विधानसभा में 12 सीटें उन शरणार्थियों के लिए रखी गई हैं, जो बंटवारे के वक्त भारत की तरफ वाले जम्मू-कश्मीर से गए थे. ये सीटें 1940 के दशक के अंत से किसी न किसी रूप में मौजूद हैं. 1974 के संविधान में इन्हें औपचारिक जगह मिली. और आज तक ये जारी हैं.

शुरुआत में इसकी वजह समझ में आती थी. उस समय पाकिस्तान को उम्मीद थी कि जल्द ही कश्मीर में जनमत संग्रह होगा. जो लोग भारतीय कश्मीर से आए थे, उन्हें अस्थायी माना गया. सोचा गया कि जब जनमत संग्रह होगा, तो उनका भी हिस्सा होगा. इसलिए उन्हें आजाद कश्मीर की विधानसभा में प्रतिनिधित्व दिया गया. यह एक अस्थायी व्यवस्था थी. लेकिन जनमत संग्रह कभी नहीं हुआ. और अस्थायी व्यवस्था स्थायी बन गई. आज 75 साल से ज्यादा समय बाद भी उन परिवारों की अगली पीढ़ियां इन 12 सीटों पर वोट देती हैं.

Indien Srinagar 2025 | Parlament gedenkt verstorbener Abgeordneter in Jammu und Kaschmir
'आजाद कश्मीर' की असेंबली में 45 सदस्य हैं जिनमें 12 कश्मीर से बाहर के इलाकों से चुनकर आते हैं.तस्वीर: Waseem Andrabi/Hindustan Times/Sipa USA/picture alliance

कई लोग पाकिस्तान में ही पैदा हुए. वहीं पले-बढ़े. पाकिस्तानी पहचान पत्र रखते हैं. भारतीय कश्मीर से उनका कोई व्यावहारिक रिश्ता नहीं बचा है फिर भी वे आजाद कश्मीर की विधानसभा के 45 सदस्यों में से 12 को चुनते हैं. वे वहां वोट नहीं देते जहां वे रहते हैं. वे वहां वोट देते हैं जहां उनके परिवार कभी रहते थे. यानी घड़ी 1947 पर ही अटकी हुई है.

आलोचकों का कहना है कि ये 12 लोग पाकिस्तान की सरकार के एजेंडे को कश्मीर सरकार में लागू कराने के काम आते हैं. 45 सदस्यों वाली विधानसभा में सरकार किसी की बनेगी और किसकी नहीं, यह तय करने में ये 12 सदस्य अहम भूमिका निभाते हैं. इसीलिए अकसर ऐसा होता है जिस पार्टी की सरकार पाकिस्तान में होती हैं, उसी की या फिर उसके किसी सहयोगी दल की सरकार पाकिस्तानी कश्मीर में होती है.

इंतजार कब तक?

इस महीने की शुरुआत से कश्मीर में इन 12 सीटों को लेकर भारी गुस्सा दिखाई दे रहा है. जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी, जिसे जेएएसी कहा जाता है, इन सीटों को खत्म करने की मांग करती है. उनकी बात बहुत सीधी है. जो लोग किसी क्षेत्र की विधानसभा चुनते हैं, उन्हें उस क्षेत्र में रहना चाहिए. यह लोकतंत्र का बुनियादी नियम है.

जून 2026 की शुरुआत में कश्मीर की सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये सीटें संविधान से सुरक्षित हैं. इन्हें हटाने के लिए संविधान में बदलाव जरूरी है. कानूनी रूप से यह फैसला समझ में आ सकता है. लेकिन कश्मीरियों के लिए इसका मतलब साफ था कि वे अपनी विधानसभा को खुद नहीं बदल सकते. यह फैसला सिर्फ पाकिस्तान कर सकता है.

और पाकिस्तान ऐसा नहीं करेगा. क्यों? क्योंकि ये 12 सीटें सिर्फ सीटें नहीं हैं. ये पाकिस्तान की पूरी कश्मीर नीति का छोटा लेकिन जरूरी खंभा हैं. अगर पाकिस्तान इन्हें खत्म करता है, तो वह मान लेगा कि ये शरणार्थी अब लौटने का इंतजार नहीं कर रहे. यानी 1947 वाली राजनीतिक स्थिति अब वैसी नहीं रही.

यह बात पाकिस्तान की कश्मीर वाली कहानी को कमजोर कर देगी. इसलिए आजाद कश्मीर के लोगों से बार-बार कहा जाता है. इंतजार करो. राज्य के हित में इंतजार करो. कश्मीर के नाम पर इंतजार करो. पर लोग अब पूछने लगे हैं कि कब तक?

Pakistan Muzaffarabad 2025 | Polizei setzt Tränengas gegen Demonstranten im pakistanisch verwalteten Kaschmir ein
हालिया विरोध प्रदर्शनों में 20 से ज्यादा लोग मारे गए हैंतस्वीर: M.D. Mughal/AP Photo/picture alliance

मुश्किल वार्ताकार

जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पाकिस्तान की सत्ता के लिए आसान विरोधी नहीं है. यह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. इसका कोई एक बड़ा नेता नहीं है, जिसे पद देकर शांत किया जा सके. यह कोई अलगाववादी आंदोलन भी नहीं है. इसने न भारत में मिलने की मांग की. न स्वतंत्र देश बनाने की. यह धार्मिक आंदोलन भी नहीं है. यह आम लोगों का गठबंधन है. व्यापारी. वकील. छात्र. ट्रांसपोर्टर. किसान.

जेएएसी पहली बार बड़ी ताकत के रूप में मई 2024 में उभरी. उस समय बिजली के बिल और आटे की कीमतों पर विरोध शुरू हुआ. तब इस्लामाबाद ने ज्यादातर मांगें मान लीं लेकिन कई अहम मांगें लटक गईं. जिनमें पाकिस्तान में बसे शरणार्थियों का मुद्दा भी है.

अभी जो आंदोलन चल रहा है, उसका मुद्दा खास तौर पर वही 12 सीटें हैं. और सरकार की प्रतिक्रिया बहुत कठोर है. जेएएसी को आजाद जम्मू-कश्मीर एंटी-टेररिज्म एक्ट के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया गया.

पाकिस्तान की नागरिक सरकारें जेएएसी से बात करती रही हैं. समझौते भी करती रही हैं. लेकिन उन्हें लागू नहीं कर पाईं. यह सिर्फ प्रशासनिक नाकामी नहीं है. इसके पीछे असली वजह सत्ता की संरचना है.

कश्मीर की अहमियत

कश्मीर में पाकिस्तान की सेना की दिलचस्पी बहुत गहरी है. यह इलाका लाइन ऑफ कंट्रोल पर है. पाकिस्तानी सेना के लिए यह सिर्फ एक क्षेत्र नहीं है. यह भारत के खिलाफ उसकी रणनीति का हिस्सा है. इसीलिए यहां असली स्वायत्तता देना आसान नहीं है. अगर पाक प्रशासित कश्मीर को सच में अधिकार दिए जाते हैं, तो सेना को अपनी पकड़ ढीली करनी पड़ेगी. और ऐसा अब तक नहीं हुआ.

2019 में भारत ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटा दिया. पाकिस्तान ने इसे अवैध बताया. संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का उल्लंघन कहा. मुस्लिम बहुल क्षेत्र की जनसांख्यिकी बदलने की कोशिश, कहा. इन बातों पर अलग से बहस हो सकती है.

लेकिन पाकिस्तानी कश्मीर के आम लोगों पर इसका एक दूसरा असर पड़ा. उन्हें लगा कि भारत ने अपने हिस्से के कश्मीर को लेकर फैसला कर लिया है. इसके बाद भारत ने जम्मू-कश्मीर में सड़कें, अस्पताल, कनेक्टिविटी और विकास योजनाओं पर पैसा लगाया. यह सब देखकर कथित पाक प्रशासित कश्मीर के लोगों ने तुलना की. एक तरफ भारत अपने हिस्से को अपने राष्ट्रीय ढांचे में जोड़ रहा था.

दूसरी तरफ पाकिस्तान अपने हिस्से को संवैधानिक धुंध में रखे हुए था. न पूरा अधिकार. न पूरा पैसा. न पूरी भागीदारी. सिर्फ यह कहा जाता रहा कि यह इलाका खास है. इस खास इलाके के लोग अब हिसाब मांग रहे हैं. और पाकिस्तान के लिए ये हिसाब ना देते बन रहा है ना लेते. यह 75 साल के अटके हुए उसी हिसाब का गुस्सा है.