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राजनीतिदक्षिण कोरिया

द. कोरिया: ट्रंप की भारी-भरकम मांगों पर लोगों की क्या है राय

जूलियान रायल
३० अक्टूबर २०२५

ट्रंप चाहते हैं कि दक्षिण कोरिया, अमेरिका में 350 अरब डॉलर का निवेश पक्का करे. साथ ही, वह उत्तर कोरिया के लीडर किम जोंग उन से भी सीधी मुलाकात चाहते हैं. क्या दक्षिण कोरिया ट्रंप की इन मांगों को पूरा कर पाएगा?

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Südkorea Gyeongju 2025 | Donald Trump erhält Großkreuz des Mugunghwa-Ordens
तस्वीर: Mark Schiefelbein/AP Photo/picture alliance

एशिया के अपने पांच दिवसीय दौरे में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की यात्रा का आखिरी पड़ाव दक्षिण कोरिया था. दक्षिण कोरिया आने से पहले ही ट्रंप ने दो स्पष्ट प्राथमिकताएं तय कर ली थीं, जिन्हें वह हासिल करना चाहते हैं.

पहली वरीयता यह है कि दक्षिण कोरिया की सरकार अमेरिका में 350 अरब डॉलर का निवेश सुनिश्चित करे. ट्रंप की दूसरी प्राथमिकता उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ आमने-सामने की मुलाकात तय करना है. जैसा कि उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में किया था.

29 अक्टूबर को राष्ट्रपति ट्रंप और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जेइ म्यूंग के बीच व्यापार समझौते के ब्योरों पर सहमति बन गई. ट्रंप ने कहा, "हमारे बीच डील हो गए, तकरीबन अंतिम रूप दे दिया गया."

दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में ट्रंप प्रशासन द्वारा ट्रेड डील के लिए बनाए जा रहे दबाव का विरोध करते नागरिक
दक्षिण कोरिया के कई लोगों को लगता है कि उनके देश को अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करने के लिए मजबूर किया जा रहा हैतस्वीर: Jung Ui-Chel/Matrix Images/picture alliance

दोनों सहयोगी देशों के बीच जुलाई में एक समझौता हुआ था. इसके तहत ट्रंप के लगाए टैरिफ को कम करने के एवज में दक्षिण कोरिया, अमेरिका में 350 अरब डॉलर के नए निवेश करने के लिए राजी हुआ. मगर, इन निवेशों का प्रारूप क्या हुआ, इसपर सहमति नहीं बन पाई थी.

ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात से क्या हासिल हो सकता है?

अब, ट्रंप और ली इस बात पर सहमत हुए कि सोल ने 350 अरब डॉलर के जिस निवेश का वादा किया है, उसके दो हिस्से किए जाएंगे. 200 अरब डॉलर की राशि नकद किस्तों में दी जा सकेगी. एक किस्त करीब 20 अरब डॉलर की होगी. बाकी बचे 150 अरब डॉलर को जहाज निर्माण पर निवेश के रूप में खर्च करना होगा.

350 अरब डॉलर के निवेश पर गतिरोध बना हुआ था

दक्षिण कोरिया में राष्ट्रपति ली जेइ म्यूंग की सरकार इस समय एक बड़े आर्थिक दबाव का सामना कर रही है. अमेरिका की ओर से 350 अरब डॉलर के निवेश पैकेज की मांग की जा रही थी, जिसके जिसके बदले ट्रंप कोरियाई आयात पर टैरिफ कम करने का वादा कर रहे थे.

दक्षिण कोरियाई अधिकारियों के मुताबिक, इस निवेश का अधिकांश हिस्सा लोन और लोन गारंटी के रूप में इस्तेमाल किया जाना था. ताकि, दक्षिण कोरियाई कंपनियां अमेरिका में नया ढांचा बना सकें.

उधर ट्रंप चाहते थे कि सोल यह पूरी रकम नकद या शेयरों के रूप में "पहले ही" अमेरिका में निवेश कर दे. राष्ट्रपति ली का कहना था कि इतनी बड़ी नकद राशि का भुगतान देश के वित्तीय बाजार को अस्थिर कर सकता है. यही वजह थी कि समझौते पर सहमति नहीं बन पा रही थी.

दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में ट्रंप प्रशासन द्वारा ट्रेड डील के लिए बनाए गए दबाव के विरोध में रैली निकालते लोग.
दक्षिण कोरिया के कई लोगों को आशंका है कि अगर ट्रंप की मांगें ना मानी गईं, तो वह फिर से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का डर दिखाएंगे. ट्रंप के आने से पहले अमेरिकी दूतावास के बाहर कई विरोध प्रदर्शन भी हुएतस्वीर: Jung Ui-Chel/Matrix Images/IMAGO

दक्षिण कोरिया में ट्रंप का ठंडा स्वागत!

पिछले कुछ दिनों में सोल स्थित अमेरिकी दूतावास के बाहर कई प्रदर्शन हुए. कई दक्षिण कोरियाई नागरिकों को लगता है कि अमेरिका व्यापारिक समझौतों का दबाव डालकर उनके देश को मजबूर कर रहा है. उन्हें डर है कि अगर ट्रंप की मांगें नहीं मानी गई, तो वह फिर से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की धमकी दे सकते हैं.

इसके अलावा, लोगों में अब भी सितंबर में अमेरिका के जॉर्जिया राज्य में ह्यूंदै प्लांट पर हुई आईसीई (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) की छापेमारी को लेकर नाराजगी बनी हुई है. इस छापे में 300 से अधिक दक्षिण कोरियाई कर्मचारियों को हिरासत में लिया गया था, जिन्हें बाद में सोल वापस भेज दिया गया था.

दक्षिण कोरिया की विदेश मंत्री, चो ह्यून ने बीते हफ्ते बताया कि इस घटना के बाद सोल और वॉशिंगटन में साथ मिलकर एक वर्किंग ग्रुप बनाने पर सहमति बनी. यह वर्किंग ग्रुप भविष्य के दक्षिण कोरियाई निवेश परियोजनाओं के लिए एक नई वीजा श्रेणी तैयार करेगा.

29 अक्टूबर को दक्षिण कोरिया में ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक से पहले चीन विरोधी प्रदर्शन करते लोग. लोगों के हाथ में अमेरिका और कोरिया के झंडे हैं.
ट्रंप की पांच दिनों की एशिया यात्रा का आखिरी पड़ाव दक्षिण कोरिया था. यहां उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात हुईतस्वीर: Daniel Ceng/Anadolu Agency/IMAGO

अमेरिका का सहयोगी बनने की कीमत पर सवाल उठा रहे हैं दक्षिण कोरिया के लोग

सोल स्थित सोगांग विश्वविद्यालय की प्रोफेसर ह्योबिन ली ने कहा, "कई दक्षिण कोरियाई नागरिकों के लिए अमेरिका लंबे समय से देश का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार रहा है." ली ने यह भी जोड़ा, "लेकिन ट्रंप प्रशासन के दौरान यह धारणा बढ़ी है कि यह सुरक्षा गठबंधन अब एकतरफा आर्थिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है."

ली ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह विचार कि दक्षिण कोरिया को केवल अमेरिकी टैरिफ के नुकसान से बचने के लिए भारी निवेश करना पड़ेगा, कई लोगों को धोखे की भावना दे रहा है."

ब्लूमबर्ग से हुई एक बातचीत में प्रोफेसर ली ने बताया कि समझौते की राह में कई अड़चनें हैं. उन्होंने कहा, "अमेरिका निश्चित रूप से अपने हितों को अधिकतम करना चाहेगा. लेकिन यह ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि दक्षिण कोरिया के लिए आर्थिक आपदा की स्थिति पैदा हो जाए."

एशिया दौरे में अब जापान पहुंचे ट्रंप, चीन के साथ ट्रेड डील का इंतजार

पहले वामपंथी-झुकाव वाले "साउथ कोरियन कांग्रेस फॉर न्यू पॉलिटिक्स" के नेता रह चुके और अब किम डे-जुंग पीस फाउंडेशन के बोर्ड सदस्य, किम सांग-वू कहते हैं कि अमेरिका की मांग "बहुत बड़ी" है. उन्होंने कहा, "अमेरिका चाहता है कि कोरिया यह निवेश ज्यादातर नकद के रूप में करे, जबकि सोल इस रकम को क्रेडिट के रूप में देना चाहता है. कुल रकम हमारी जीडीपी का करीब 6.5 फीसदी है. ऐसे में अगर कोरिया इसपर सहमत होता है, तो इसका हमारी वित्तीय स्थिरता पर बहुत नकारात्मक असर पड़ सकता है."

फरवरी 2019 की इस फाइल फोटो में उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन (तस्वीर में बाईं ओर) और अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, हनोई में एक दूसरे से बात करते हुए हंस रहे हैं
डॉनल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की अब तक तीन बार मुलाकात हो चुकी है. तीनों मुलाकातें ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुईं. पहली, जून 2018 में सिंगापुर में. फिर फरवरी 2019 में वे हनोई में मिले. तीसरी मुलाकात जून 2019 में उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर बसे गांव पनमुंजोम में हुईतस्वीर: Evan Vucci/AP Photo/picture alliance

पूर्वोत्तर एशिया में सुरक्षा

27 अक्टूबर को मलेशिया से जापान जाते समय एयर फोर्स वन में ट्रंप ने संकेत दिया कि वह उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन के साथ अपने पहले कार्यकाल की तरह "ब्रोमेंस" (घनिष्ठ संबंध) को फिर जिंदा करना चाहते हैं. ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, "मैं उनसे मिलना चाहूंगा, अगर वे भी मिलना चाहें."

उन्होंने बीते दिनों भी इसी तरह का प्रस्ताव दोहराया था, "मैंने इंटरनेट पर यह संदेश दिया है कि मैं दक्षिण कोरिया आ रहा हूं और अगर वे (किम जोंग-उन) मुझसे मिलना चाहें, तो मैं इसके लिए तैयार हूं."

विश्लेषकों का कहना है कि दोनों नेता अनिश्चित और आवेगी स्वभाव के लिए जाने जाते हैं. ट्रंप और किम की आखिरी मुलाकात जून 2019 में पनमुंजोम गांव में हुई थी, जो उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर स्थित है. उनकी पहली बैठक जून 2018 में सिंगापुर में हुई थी, जिसका माहौल काफी सकारात्मक था. लेकिन फरवरी 2019 में हनोई वार्ता के विफल होने के बाद दोनों नेताओं के संबंध बिगड़ गए थे.

उधर किम जोंग-उन ने रूस के साथ एक सैन्य और व्यापारिक गठबंधन पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके कारण ईंधन, भोजन और अन्य जरूरी चीजों की भारी कमी काफी हद तक दूर हो गई है. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण उत्तर कोरिया में जरूरी सामग्रियों की किल्लत थी.

राजनीतिक विश्लेषक किम सांग-वू ने कहा, "यह संभव है कि दोनों (ट्रंप और किम) की मुलाकात हो जाए, लेकिन अगर ऐसा होता है तो किम की कोशिश होगी कि वह ट्रंप से अधिकतम लाभ हासिल कर सकें." उन्होंने आगे कहा, "दूसरी ओर, ट्रंप असल में इस मुलाकात की 'विजुअल पॉलिटिक्स' यानी दिखावटी तस्वीरें और सुर्खियां पाने पर ज्यादा ध्यान देंगे, बजाय इसके कि वे कोई ठोस पेशकश करें. मुझे नहीं लगता कि किम को प्रभावित करने के लिए यह पर्याप्त होगा."

ट्रंप ने जो चाहा, टैरिफ ने उसका उल्टा किया

दक्षिण कोरिया 'बदल चुका है'

सोगांग विश्वविद्यालय की प्रोफेसर ली ह्योबिन का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन को यह समझना होगा कि दक्षिण कोरिया की राजनीतिक नेतृत्व शैली अब बदल चुकी है, खासकर व्यापारिक नीतियों के संदर्भ में. उन्होंने कहा, "वर्तमान प्रशासन से उम्मीद की जा रही है कि वह बातचीत को अधिक आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ाएगा."

ली ने आगे जोड़ा कि ट्रंप शायद यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह एक बड़ी निवेश संधि पर हस्ताक्षर कर अपनी कुशल वार्ताकार की छवि को और मजबूत कर सकेंगे. उन्होंने कहा, "यह समझौता तभी संभव होगा, जब इसकी शर्तें दोनों पक्षों के लिए समान रूप से लाभकारी होंगी, न कि ऐसा करने पर जहां केवल एक पक्ष पर दबाव डाला जा रहा है."

संपादित: स्वाति मिश्रा