ईयू के शरणार्थी नियमों में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव लागू
यूरोपीय संघ ने अपनी माइग्रेशन नीति को बिल्कुल नया रूप दे दिया है. ईयू देशों की सीमाओं पर कड़ी निगरानी, फास्ट-ट्रैक रिजेक्शन और सदस्य देशों के बीच साझा जिम्मेदारी के नए नियम 12 जून से लागू हो गए हैं.

सीमा पर अनिवार्य स्क्रीनिंग
यूरोपीय संघ में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले हर प्रवासी को अब अनिवार्य स्क्रीनिंग प्रक्रिया से गुजरना होगा. इसमें सात दिनों के भीतर उनकी पहचान, सुरक्षा जांच और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दर्ज की जाएगी. प्रवासियों की चेहरे की तस्वीरें और उंगलियों के निशान (बायोमिट्रिक) एक साझा डाटाबेस में सेव किए जाएंगे ताकि यह तय किया जा सके कि उन्हें शरण मिलनी चाहिए या उन्हें वापस उनके देश भेजा जाना चाहिए.
'फास्ट-ट्रैक' रिजेक्शन की प्रक्रिया
जिन प्रवासियों के शरणार्थी का दर्जा पाने की संभावना कम है (जैसे मोरक्को या बांग्लादेश जैसे देशों से आने वाले, जहां 80 फीसदी मामलों में आवेदन खारिज होते हैं) या जिन्हें सुरक्षा जोखिम माना जाता है, उनके आवेदनों का निपटारा बहुत तेजी से किया जाएगा. ये प्रक्रियाएं सीमाओं के पास स्थित केंद्रों पर केवल 12 हफ्ते में पूरी की जाएंगी, जिससे प्रवासियों के लिए अनिश्चितता और हिरासत का समय बढ़ने का डर है.
एकजुटता पर आधारित सिस्टम
अभी तक नियम यह था कि जो प्रवासी जिस देश में पहले कदम रखेगा, उसी देश की जिम्मेदारी उसका केस संभालने की होगी. इससे इटली, ग्रीस और माल्टा जैसे देशों पर अत्यधिक बोझ पड़ता था. नये नियम में अन्य सदस्य देशों को या तो शरणार्थियों को स्वीकार करना होगा या फिर हर एक प्रवासी के बदले संबंधित देश को 20,000 यूरो की वित्तीय सहायता देनी होगी. ऐसे अधिकतम शरणार्थियों की सीमा सालाना 30,000 तय की गई है.
इमरजेंसी के लिए खास प्रावधान
शरणार्थियों की अप्रत्याशित लहरों से निपटने के लिए एक 'इमरजेंसी रिस्पॉन्स' सिस्टम बनाया गया है. यदि कभी ऐसी स्थिति आती है या रूस-बेलारूस जैसे देश जानबूझकर सीमा पर प्रवासियों को भेजकर अस्थिरता पैदा करते हैं, तो सदस्य देशों को प्रवासियों के अधिकारों में कटौती करने और उन्हें लंबी अवधि तक हिरासत केंद्रों में रखने की छूट दी गई है.
मानवाधिकारों से जुड़ी चिंताएं
कई मानवाधिकार समूह इन सुधारों की कड़ी आलोचना कर रहे हैं. उनका तर्क है कि ये कड़े नियम मानवीय संवेदनाओं के बजाय केवल राजनीति से प्रेरित हैं. इसके अलावा, कई सदस्य देशों ने अभी तक इन नए नियमों को लागू करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा और तकनीकी प्रणालियां तैयार नहीं की हैं, जिससे आने वाले समय में प्रशासनिक जटिलताएं और कानूनी विवाद बढ़ने की पूरी संभावना है.