ब्रह्मपुत्र का कहर: बाढ़ और कटाव निगल रहे बांग्लादेश की जमीन
हर साल बांग्लादेश के उत्तरी कुरिग्राम जिले के सैकड़ों परिवार ब्रह्मपुत्र नदी के कहर को झेलते हैं. यहां नदी तेजी से जमीन को काट रही है. लोग नदी के आगे बेबस हो चुके हैं.

एक बार फिर नदी की चपेट में आशियाना
नुरुन नबी बांस के खंभों और टिन की चादरों को लकड़ी की नाव पर लाद रहे हैं. उनका सिर्फ एक साल पहले ब्रह्मपुत्र नदी के एक नाजुक द्वीप पर बना घर, अब पानी की चपेट में आने की कगार पर है. चार बच्चों के पिता को एक साल में दूसरी बार घर छोड़ना पड़ रहा है.
हर दिन करीब आती नदी
थकी हुई आवाज में नबी कहते हैं, "हर दिन नदी और पास आती है." नबी कहते हैं, "हम तो जैसे दुख झेलने के लिए ही पैदा हुए हैं. यह संघर्ष कभी खत्म नहीं होता. कितनी बार नदी ने मेरा घर निगल लिया... अब तो गिनती भी भूल गया हूं."
पानी में सबकुछ तबाह
50 साल के नबी के चावल और दाल के खेत पहले ही बह चुके हैं. अब वह एक अन्य द्वीप पर जा रहे हैं. उन्होंने कहा, "मुझे नहीं पता नया ठिकाने पर हम कितने वक्त रहेंगे, अगर किस्मत साथ दे, तो कुछ साल… नहीं तो शायद एक महीना. यही हमारी जिंदगी है."
रातों रात गायब होती जमीन
हर साल बांग्लादेश के उत्तरी कुरिग्राम जिले में सैकड़ों परिवार एक ही त्रासदी झेलते हैं. जब नदी के किनारे ढहते हैं, तो लोग सिर्फ अपना घर ही नहीं खोते, बल्कि उनकी जमीन, फसलें और पशुधन भी. ब्रह्मपुत्र, तीस्ता और धरला नदियां जो कभी लाखों लोगों की जीवनरेखा थीं, वही अब अनिश्चित हो गई हैं और तेजी से जमीन को काट रही हैं.
रेत के टापू पर जिंदगी
देश के उत्तरी मैदानों में बिखरे रेतीले, बनते-बिखरते द्वीप बांग्लादेश के सबसे कमजोर इलाके हैं. यहां परिवार बार-बार अपना घर बनाते हैं, लेकिन हर बार नदी सब कुछ छीन लेती है.
बिना चेतावनी के आती नदी
70 साल के किसान हबीबुर रहमान कहते हैं, "पानी बिना चेतावनी के आता है." कई रेतीले द्वीपों पर रह चुके रहमान कहते हैं, "रात को सोते हैं और सुबह तक नदी का किनारा बढ़ जाता है. जब हम जागते हैं तो पता चलता है कि घर नहीं रहा. हमारी जिंदगी में सुकून नाम की कोई चीज नहीं है."
हिमालयी ग्लेशियरों से आती तबाही
कुरिग्राम में जलवायु परिवर्तन का असर अब आंखों के सामने है. वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ब्रह्मपुत्र और तीस्ता जैसी नदियों में पानी का स्तर बढ़ रहा है. नतीजा यह है कि बांग्लादेश के उत्तरी इलाकों में रेतीले टापू लगातार नदी के कटाव का शिकार हो रहे हैं.
बदलता मौसम का पैटर्न
जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ एनुन निशात कहते हैं कि ग्लेशियरों का पिघलना 1990 के दशक की तुलना में लगभग दोगुनी गति से हो रहा है, जिससे अतिरिक्त पानी ब्रह्मपुत्र और तीस्ता जैसी नदियों में बह रहा है. यह पहले से ही उफनती नदियों को और खतरनाक बना रहा है. इसी बीच, मॉनसून का पैटर्न भी अस्थिर हो गया है, जो कभी जल्दी आता है, कभी लंबा चलता है, और कभी अचानक तेज बारिश होने लगती है.
35 बार बहा एक घर
विश्व बैंक का अनुमान है कि 2050 तक हर सातवें बांग्लादेशी को जलवायु से जुड़ी आपदाओं के कारण अपना घर छोड़ना पड़ सकता है. यह संकट पहले ही कई परिवारों की जिंदगी बदल चुका है. सात बच्चों के पिता 50 साल के कासिमउद्दीन कहते हैं कि उनके लिए घर बदलना अब रोजमर्रा की बात हो गई है. उन्होंने कहा, "मेरी जिंदगी में नदी ने मेरा घर 30 से 35 बार, या शायद उससे भी ज्यादा बार छीना है."