घाना में ऑइस्टर के सहारे चल रही महिलाओं की जिंदगी
घाना में कई ग्रामीण महिलाओं के लिए ऑइस्टर पालना आमदनी का अहम जरिया है. और, ऑइस्टर पालने के लिए जरूरी हैं मैंग्रोव. अब जलवायु परिवर्तन के कारण मैंग्रोव खत्म होते जा रहे हैं. डर है कि कहीं ऑइस्टर पालन भी ना खत्म हो जाए.

मैंग्रोव के बीच से होकर गुजरता जीवन
बीट्रिस नुटेक्पोर हर सुबह जाल और टोकरी लेकर मैंग्रोव में उतरती हैं. पीढ़ियों से जारी ऑइस्टर चुनने की दिनचर्या इन्हीं मैंग्रोव में शुरू हुई. घाना दुनियाभर में ऑइस्टर की सप्लाई करता है. बीट्रिस के लिए तो ये काम उनकी आजीविका का सहारा है.
ऑइस्टर चुनने की कला और परंपरा
झुकी हुई पीठ और गीली हथेलियां इस मुश्किल काम की सच्चाई बयान करती हैं. पानी और कीचड़ के बीच से निकाले जाने वाले ऑइस्टर इन महिलाओं के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं और उनके घर का चूल्हा जलाते हैं.
ऑइस्टर से भरी टोकरी और उम्मीद का वजन
एक टोकरी भरने पर उन्हें बस कुछ ही घाना सेडी (मुद्रा) मिलते हैं. इनकी कीमत समझिए, लगभग चार डॉलर के बराबर. बीट्रिस इस मामूली कमाई में ही अपना घर चलाती हैं. इतना ही नहीं, इसी के सहारे वह अपनी बेटियों को स्कूल भी भेजती हैं.
जलवायु परिवर्तन से खत्म होती रोजी
मैंग्रोव आम झाड़ियां नहीं हैं. ये समंदर की तेज लहरों से भिड़ती हैं और यहां के ईकोसिस्टम के लिए एक ढाल का काम करती हैं. ये कवच बनकर मिट्टी को कटाव से बचाती हैं और ऑइस्टर को खुद से जोड़ती हैं. मगर गर्म होती पृथ्वी और अंधाधुंध व असंतुलित विकास के कारण यहां करीब 80 फीसदी मैंग्रोव के इलाके तबाह हो गए हैं.
जोखिम भरा काम
मैंग्रोव की जड़ों के अभाव में ऑइस्टर गहरे पानी में चले जाते हैं. ऐसे में नुटेक्पोर के लिए मैंग्रोव के नष्ट होने का मतलब है, कई घंटों तक 30 फीट या उससे भी ज्यादा गहराई में गोता लगाना और डूबने का जोखिम उठाना. इतना संघर्ष बस इसलिए कि वे ऑइस्टर की तलाश कर सकें.
भू राजनीति लगा रही परंपरा में सेंध
डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका से आने वाली विदेशी सहायता में कटौती की गई. नतीजतन, गैर-लाभकारी संस्था 'डेवलपमेंट एक्शन एसोसिएशन' का ट्रेनिंग प्रोग्राम बंद हो गया. इसके कारण महिलाओं को अपनी पीढ़ीगत परंपरा जारी रखने और रोजी चलाने का कोई दूसरा रास्ता खोजना पड़ रहा है.
डेंसु ऑइस्टर पिकर्स एसोसिएशन का सहारा
घाना विश्वविद्यालय में मत्स्य विज्ञान के प्रोफेसर फ्रांसिस नुनू ने कहा, "जब ऐसी स्थिति आती है जहां पहले से ही तेज पानी का बहाव अधिक तेज हो जाता है, तो ऑइस्टर विकसित नहीं हो पाते." इस परंपरा और रोजीरोटी को संजोकर रखने के लिए 'डेंसु ऑइस्टर पिकर्स एसोसिएशन' में महिलाएं मिलकर नियम बनाती हैं. ताकि कोई समय से पहले पेड़ ना काटे, वो झाड़ियां लंबी हो जाएं और फिर ऑइस्टर उनपर लिपट सकें.
परिवार के लिए, आने वाली पीढ़ियों के लिए
बीट्रिस और उनकी साथी कहती हैं, "यह मेहनत हम बच्चों के लिए करती हैं. पानी से ही हमारी आजीविका चलती है."
मां से बेटी तक, परंपरा की डोरी
बीट्रिस अपने बच्चों को यही काम सिखाना चाहती हैं. वह चाहती हैं कि एक दिन उनकी बेटी अपनी बेटी को ऑइस्टर चुनने का ये हुनर सिखाए. पीढ़ियों से चली आ रही यह विरासत पीढ़ियों तक चलती जाए. यह उनका पारिवारिक कारोबार है और वह चाहती हैं कि यह यूं ही जारी रहे.