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ग्रीनलैंड लेने में बाधा डाली तो लगेगा टैरिफ: ट्रंप

अविनाश द्विवेदी एएफपी, डीपीए
१७ जनवरी २०२६

ग्रीनलैंड के अधिग्रहण के लिए डॉनल्ड ट्रंप अपने यूरोपीय सहयोगियों को धमकाने से भी नहीं हिचक रहे हैं. लेकिन इस खींचतान के चलते नाटो का भविष्य खतरे में नजर आ रहा है.

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USA Washington 2026 | US-Präsident Donald Trump spricht zur Rückkehr aus Detroit zu Pressevertretern in Maryland
तस्वीर: Mandel Ngan/AFP/Getty Images

यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में तनाव और बढ़ता जा रहा है. अमेरिका की ग्रीनलैंड पर कब्जे की इच्छा इसकी नई वजह बनी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप किसी भी तरह से ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने पर तुले हुए हैं, वहीं फ्रांस और जर्मनी ने ग्रीनलैंड में अपनी सेनाएं तैनात कर दी हैं. माना जा रहा है कि अमेरिका और यूरोप के बीच ग्रीनलैंड पर तनाव इसी तरह बना रहा तो नाटो का भविष्य भी खतरे में आ सकता है. 

हाल ही में बाडेन-वुर्टेमबर्ग में एक स्थानीय चुनावी कार्यक्रम में जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने कहा कि यूरोप अब पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहकर आगे नहीं बढ़ सकता. इस बयान को ग्रीनलैंड पर अमेरिका के हालिया रुख से जोड़ा गया. यूरोप में जानकार मान रहे हैं कि अमेरिका अब नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था से हटकर शक्ति आधारित मॉडल की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में मैर्त्स ने चेतावनी दी है कि यूरोप अगर समय रहते खुद को मजबूत नहीं करता, तो बदलते वैश्विक ढांचे में उसकी जगह कम हो सकती है. 

ग्रीनलैंड अधिग्रहण में बाधा डालने वालों पर टैरिफ लगाएंगे ट्रंप

उधर, अटलांटिक के उस पार अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एकदम अलग संदेश दिया. वॉशिंगटन में एक कार्यक्रम में उन्होंने धमकी दी कि जो देश उनके ग्रीनलैंड अधिग्रहण के प्लान का समर्थन नहीं करेंगे, उन पर वे टैरिफ लगा सकते हैं. ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, ट्रंप के मुताबिक अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है. 

ट्रंप इससे पहले भी ग्रीनलैंड पर अपना दावा जता चुके हैं, लेकिन इस बार उन्होंने सीधे सैन्य विकल्प का संकेत देकर तनाव को और बढ़ा दिया. उन्होंने यह भी कहा कि अगर नाटो इस मुद्दे पर सहयोग नहीं करता, तो अमेरिका इसमें अपनी "केंद्रीय भूमिका" पर पुनर्विचार कर सकता है. हालांकि यूरोपीय नाटो देशों ने हाल के दिनों में डेनमार्क और ग्रीनलैंड के समर्थन में सैनिक भेजे हैं. 

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अमेरिका के साथ बातचीत जारी

इस बीच डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्रियों ने वॉशिंगटन में बातचीत जरूर की है, हालांकि वे इसे "बुनियादी असहमति" की बातचीत ही कहते रहे हैं. हालांकि अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड तीनों ने एक वर्किंग ग्रुप बनाने पर सहमति जताई है. वहीं इस बीच यूरोपीय संघ के देश ग्रीनलैंड में अपनी सेनाओं की तैनाती भी बढ़ा रहे हैं लेकिन ट्रंप ने साफ कर दिया कि यूरोपीय सैनिकों की तैनाती से उनके "अधिग्रहण के लक्ष्य" पर कोई असर नहीं पड़ेगा. 

मैर्त्स के बयान और ट्रंप की धमकियों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर और साफ होती है. यूरोप को लग रहा है कि वह ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल रही हैं और यूरोप को अपनी रणनीतिक दिशा खुद तय करनी होगी. वहीं डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अपने हितों के लिए सहयोगियों पर भी आर्थिक और सैन्य दबाव का इस्तेमाल करने से नहीं हिचक रहा है. 

आने वाले वर्षों में जर्मनों का करना होगा ज्यादा काम

बदलती भू-राजनीतिक स्थिति के बीच जर्मन चांसलर मैर्त्स ने जर्मनी के भीतर भी आत्ममंथन की बात कही. मैर्त्स के मुताबिक, देश की इंडस्ट्रियल बेस को बचाए रखने के लिए जर्मनों को आने वाले वर्षों में ज्यादा और लंबे समय तक काम करना होगा. उनका कहना था कि मजबूत अर्थव्यवस्था के बिना जर्मनी ना राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर पाएगा, ना सामाजिक समस्याओं का. 

भू-राजनीति की यह नई रेखा यूरोप, अमेरिका और आर्कटिक क्षेत्र के भविष्य पर दूरगामी असर छोड़ सकती है. और पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी आने वाले महीनों में तनाव के और ज्यादा बढ़ने के संकेत हैं. 

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